भोजशाला इतिहास में पहली बार! मुख्यमंत्री करेंगे मां वाग्देवी के दर्शन, थोड़ी देर में रोड शो

धार 
भोजशाला इन दिनों पूरी तरह भगवामय नजर आ रही है। मां सरस्वती मंदिर के रूप में मान्यता मिलने के बाद यहां लगातार धार्मिक आयोजन हो रहे हैं और देशभर से श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ गया है। सोमवार को इस ऐतिहासिक स्थल पर एक नया अध्याय जुडऩे जा रहा है, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं भोजशाला पहुंचकर गर्भगृह में विराजित मां वाग्देवी के दर्शन और पूजन करेंगे।

इतिहास में पहली बार
इतिहास में यह पहला (Historic Day) अवसर माना जा रहा है, जब मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए कोई राजनीतिक हस्ती भोजशाला में विधिवत दर्शन-पूजन करने पहुंचेगी। इसे लेकर हिंदू समाज और स्थानीय नागरिकों में खासा उत्साह दिखाई दे रहा है। 

वसंत पंचमी की तर्ज पर सजी भोजशाला
धारभोजशाला परिसर को बसंत पंचमी की तर्ज पर सजाया गया है। परिसर और आसपास के क्षेत्र में भगवा ध्वज, पताकाएं और स्वागत बैनर लगाए गए हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक आस्था और उत्सव की भावना से सराबोर हो उठा है। अटल से मोदी तक कई दिग्गज कर चुके हैं दर्शन भोजशाला लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र रही है।

यहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिघल, प्रवीण तोगडिय़ा, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और शिवराज सिंह चौहान जैसे कई बड़े नेता और हिंदू संगठनों से जुड़े चेहरे दर्शन कर चुके हैं।

पीएम तक पहुंच चुके हैं भोजशाला
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भोजशाला पहुंच चुके हैं। अब बतौर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का दौरा राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संभावना जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री इस अवसर पर ‘भोजसरस्वती लोक’ जैसी बड़ी घोषणा भी कर सकते हैं।

900 मीटर तक जनता के बीच पैदल चलेंगे मुख्यमंत्री
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री सोमवार सुबह करीब 10 बजे हेलीकॉप्टर से धार पहुंचेंगे। डीआरपी लाइन हेलीपेड से वाहन द्वारा राजवाड़ा पहुंचने के बाद वहां से भोजशाला तक भव्य रोड शो निकलेगा। करीब 900 मीटर लंबा यह मार्ग पूरी तरह स्वागत द्वारों, बैनरों और धार्मिक सजावट से सुसज्जित किया गया है। रोड शो के दौरान बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता, साधु-संत और स्थानीय नागरिक मौजूद रहेंगे।

भोजशाला पहुंचने पर मुख्यमंत्री पुलिस चौकी के सामने मुख्य प्रवेश द्वार से पैदल गर्भगृह तक जाएंगे और मां वाग्देवी का पूजन-अर्चन करेंगे। मुख्यमंत्री का धार प्रवास दो घंटे से अधिक समय तक रहने की संभावना है।

धारेश्वर और मां गढ़ कालिका के भी करेंगे दर्शन
मुख्यमंत्री अपने धार दौरे के दौरान धारेश्वर मंदिर और मां गढ़ कालिका मंदिर में भी दर्शन-पूजन करेंगे। देवीजी मंदिर क्षेत्र में जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत विशेष श्रमदान कार्यक्रम रखा गया है। मुख्यमंत्री घाट की साफ-सफाई में भी हिस्सा लेंगे और जल संरक्षण का संदेश देंगे।

गंगा दशहरा आयोजन में हितग्राहियों को देंगे सौगात
मुख्यमंत्री का यह दौरा शासकीय कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जा रहा है, जिसे ‘गंगा दशहरा कार्यक्रम’ नाम दिया गया है। मुख्य आयोजन मोती बाग चौक पर होगा, जहां विशाल वाटरप्रूफ डोम और भव्य मंच तैयार किया गया है। सभा के दौरान मुख्यमंत्री विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के हितग्राहियों को लाभ वितरित करेंगे। साथ ही विकास कार्यों और नई परियोजनाओं की घोषणाएं भी संभव मानी जा रही हैं। प्रशासनिक स्तर पर कार्यक्रम को लेकर व्यापक तैयारियां की गई हैं।

NEET UG Re-Exam को लेकर NTA की नई गाइडलाइन जारी, नए छात्रों की एंट्री पर रोक

भोपाल.

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने NEET UG री-एग्जाम और परीक्षा शुल्क रिफंड को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। एजेंसी के अनुसार री-एग्जाम 21 जून को दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:15 बजे तक आयोजित किया जाएगा। इस बार परीक्षा अवधि में 15 मिनट का अतिरिक्त समय जोड़ा गया है। पहले परीक्षा शाम 5:00 बजे तक समाप्त होती थी, लेकिन अब डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और अन्य औपचारिकताओं के लिए अतिरिक्त समय दिया जाएगा।

परीक्षा के लिए नहीं देनी होगी अतिरिक्त फीस
NTA ने स्पष्ट किया है कि री-एग्जाम में शामिल होने वाले उम्मीदवारों से किसी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। पहले जमा की गई परीक्षा फीस वापस की जाएगी और दोबारा परीक्षा के लिए भी कोई फीस नहीं देनी होगी। इस तरह री-एग्जाम उम्मीदवारों के लिए पूरी तरह निशुल्क रहेगा।

27 मई तक जमा करनी होगी बैंक डिटेल्स
परीक्षा शुल्क का रिफंड प्राप्त करने के लिए उम्मीदवारों को NTA के पोर्टल पर अपनी बैंक जानकारी जमा करनी होगी। इसके लिए एजेंसी ने ऑनलाइन सुविधा शुरू की है। उम्मीदवार लॉगिन आईडी और पासवर्ड की मदद से पोर्टल पर लॉगिन कर ‘रिफंड लिंक’ के माध्यम से अपनी बैंक डिटेल्स भर सकते हैं। बैंक डिटेल्स में खाताधारक का नाम, बैंक का नाम, अकाउंट नंबर और IFSC कोड दर्ज करना अनिवार्य होगा। उम्मीदवार चाहें तो कैंसिल चेक की स्कैन कॉपी भी अपलोड कर सकते हैं। हालांकि यह वैकल्पिक रखा गया है। NTA ने साफ किया है कि एक बार जानकारी सबमिट होने के बाद उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा। बैंक डिटेल्स जमा करने की अंतिम तिथि 27 मई निर्धारित की गई है।

नए उम्मीदवार नहीं भर सकेंगे फॉर्म
NTA के अनुसार री-नीट परीक्षा केवल उन्हीं उम्मीदवारों के लिए आयोजित की जा रही है जिन्होंने पहले आवेदन किया था। नए अभ्यर्थियों को आवेदन करने की अनुमति नहीं होगी। साथ ही उम्मीदवार अपने चुने गए परीक्षा माध्यम में भी कोई बदलाव नहीं कर पाएंगे।

सभी उम्मीदवारों को मिलेगा फीस रिफंड
एजेंसी ने कहा है कि रद्द हुई परीक्षा के लिए आवेदन करने वाले सभी उम्मीदवारों को फीस रिफंड दिया जाएगा, चाहे वे री-एग्जाम में शामिल हों या नहीं। हालांकि रिफंड पाने के लिए पोर्टल पर बैंक जानकारी देना अनिवार्य होगा।

परीक्षा केंद्र और शिकायत प्रक्रिया
NTA के मुताबिक री-एग्जाम के लिए पहले वाला परीक्षा केंद्र मिलना जरूरी नहीं है। परीक्षा केंद्र उम्मीदवारों द्वारा चुने गए शहरों के आधार पर रैंडम तरीके से आवंटित किए जाएंगे। उम्मीदवार अपने वर्तमान पते को अपडेट कर परीक्षा केंद्र के लिए दो शहरों का विकल्प चुन सकते हैं। एग्जाम सेंटर से जुड़ी किसी भी शिकायत के लिए उम्मीदवार सबूतों के साथ NTA की आधिकारिक हेल्पडेस्क ईमेल neetug2026@nta.ac.in पर संपर्क कर सकते हैं।

कांगो में इबोला को लेकर हंगामा, गलत जांच और गायब शवों पर भड़के लोग

 बुनिया
दुनिया एक बार फिर महामारी के खतरे का सामना कर रही है. अफ्रीका के कुछ देशों में इबोला वायरस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने इबोला वायरस को इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी  घोषित किया है. WHO प्रमुख ने बताया कि कांगो में इबोला के 900 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिनमें से 101 मामलों की पुष्टि की गई है। 

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के इतुरी प्रांत में रवामपारा और मोंगबवालु इलाकों में उपचार केंद्रों को जलाए जाने की घटना भी सामने आई है. जहां सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं. कुछ समुदायों में बढ़ता विरोध महामारी से निपटने की कोशिशों को और जटिल बना रहा है। 

लोगों के गुस्से की बड़ी वजह इबोला से संदिग्ध मौतों के अंतिम संस्कार को लेकर बनाए गए सख्त नियम माने जा रहे हैं. क्योंकि बीमारी के और फैलाव को रोकने के लिए प्रशासन जहां संभव हो, अंतिम संस्कार की प्रक्रिया खुद संभाल रहा है।  

लोग स्थानीय सरकार की विफलता और अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं. रॉयटर्स के मुताबिक, इबोला को लेकर जांच प्रक्रिया में खामियों का मामला भी सामने आया है. कई चुनौतियों और गलतियों की वजह से संक्रमण की पहचान में देरी हुई है। 

 कई लोगों ने इस बीमारी के फैलने की गति को लेकर चिंता व्यक्त की है, खासकर इसलिए कि इबोला को अभी भी उन वायरसों में से एक माना जाता है जिनकी मृत्यु दर बहुत अधिक है और जिन देशों में इसका प्रकोप हुआ है वहां सामाजिक जीवन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में वर्तमान में इबोला के 82 पुष्ट मामले और 7 मौतें दर्ज की गई हैं, साथ ही लगभग 750 संदिग्ध मामले और 177 संदिग्ध मौतें भी निगरानी में हैं। वहीं, पड़ोसी देश युगांडा में 5 मामलों की पुष्टि हुई है, जो सीमा पार संक्रमण फैलने के बढ़ते खतरे का संकेत देता है।

अफ्रीकी संघ (एयू) ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस प्रकोप को नियंत्रण में नहीं लाया गया तो क्षेत्र के कम से कम 10 देश – जिनमें इथियोपिया, केन्या, रवांडा और दक्षिण सूडान शामिल हैं – प्रभावित होने के जोखिम का सामना कर सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना ​​है कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की सीमाओं और क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को देखते हुए, बीमारियों के प्रकोप के राष्ट्रीय सीमाओं से परे फैलने का खतरा बहुत वास्तविक है, जो मध्य और पूर्वी अफ्रीका में स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है।

* एक संबंधित घटनाक्रम में, अफ्रीका रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (अफ्रीका सीडीसी) और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मध्य और पूर्वी अफ्रीका में तेजी से फैल रहे इबोला प्रकोप से निपटने के प्रयासों का समर्थन करने के लिए 314 मिलियन डॉलर से अधिक की तत्काल धनराशि की अपील जारी की है।

योजना के अनुसार, उपर्युक्त धनराशि का अधिकांश हिस्सा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा को बीमारी के उपचार, महामारी विज्ञान निगरानी, ​​​​नियंत्रण और प्रसार की रोकथाम के लिए आवंटित किया जाएगा।

प्राथमिकता वाले उपायों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट प्रबंधन प्रणाली की स्थापना, क्षेत्र के देशों के बीच समन्वित सीमा नियंत्रण को मजबूत करना, इबोला बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए विशेष रूप से एक वैक्सीन पर अनुसंधान में तेजी लाना, अतिरिक्त त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती और व्यापक प्रकोप की आशंका में आपातकालीन चिकित्सा आपूर्ति का भंडारण करना शामिल है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इबोला के खतरे का स्तर बढ़ाकर “बहुत उच्च” कर दिया है, जबकि कई पड़ोसी देश इस प्रकोप को पूरे क्षेत्र में फैलने से रोकने के लिए स्वास्थ्य नियंत्रणों को कड़ा करने और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य से यात्रा पर प्रतिबंध लगाने सहित निवारक उपायों को बढ़ा रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि इस आउटब्रेक का जोखिम कांगो के लिए बहुत ज्यादा है। लेकिन दुनिया के बाकी देशों में फैलने का खतरा अभी कम है। इस आउटब्रेक को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया जा चुका है।

स्वास्थ्य केंद्रों पर हमले
पूर्वी कांगो में स्वास्थ्य कर्मी और ईबोला ट्रीटमेंट सेंटरों पर हमले हो रहे हैं। पिछले हफ्ते दो शहरों में दो केंद्रों को आग लगा दी गई। इस इलाके में सालों से सशस्त्र विद्रोही समूहों की हिंसा, लोगों का विस्थापन और सरकार की नाकामी चल रही है। अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती ने स्वास्थ्य सुविधाओं को और कमजोर कर दिया है। लोगों में गुस्सा और शक की भावना है। कई लोग विदेशी मदद समूहों पर भरोसा नहीं करते। एक घटना में रवाम्पारा में युवकों का एक समूह अपने दोस्त का शव वापस लेने के लिए केंद्र जलाने आया। वे आरोप लगा रहे थे कि मदद करने वाले लोग ईबोला के बारे में झूठ बोल रहे हैं।

दफनाने की प्रक्रिया पर विवाद
ईबोला फैलने से रोकने के लिए सरकार और मदद एजेंसियां संदिग्ध मरीजों के दफनाने का जिम्मा खुद ले रही हैं। पारंपरिक तरीके में परिवार वाले शव को तैयार करते हैं और लोग जमा होते हैं, जो संक्रमण बढ़ा सकता है। इस वजह से स्थानीय लोगों में नाराजगी है। अब उत्तर-पूर्वी कांगो में शोक सभा और 50 से ज्यादा लोगों के जमा होने पर पाबंदी लगा दी गई है। कुछ दफनों की सुरक्षा के लिए सैनिक और पुलिस तैनात किए गए हैं।

क्या है इलाके की स्थिति
बताया जाता है कि पूर्वी कांगो में कई विद्रोही समूह सक्रिय हैं। कुछ विदेशी देशों से जुड़े हैं, कुछ ISIS से लिंक रखते हैं। रवांडा समर्थित M23 विद्रोही कुछ हिस्सों पर काबिज हैं। इटूरी प्रांत में कांगो सरकार का नियंत्रण है, लेकिन वह कमजोर है। एलाइड डेमोक्रेटिक फोर्सेस (ADF) नामक युगांडन इस्लामिस्ट समूह यहां हमले करता रहता है।

डॉक्टर विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार, सुरक्षा की वजह से डॉक्टर और नर्स भाग गए हैं। स्वास्थ्य केंद्र ओवरलोड हो गए हैं और कुछ जगहों पर हालात बहुत खराब हैं। UN के मुताबिक, इटूरी में करीब 10 लाख लोग हिंसा से विस्थापित हो चुके हैं। बुनिया शहर के आसपास के डिस्प्लेसमेंट कैंप्स में फैलने का डर है, जहां पहले मामले आए थे।

सामग्री की कमी
मदद करने वाली टीमों के पास जरूरी उपकरण नहीं हैं – फेस शील्ड, प्रोटेक्टिव सूट, टेस्टिंग किट, बॉडी बैग आदि। एक लोकल मदद समूह की अध्यक्ष जुलिएन लुसेंगे ने बताया कि उनके पास सिर्फ हैंड सैनिटाइजर और कुछ मास्क हैं। उन्होंने मदद मांगी है लेकिन अभी कुछ नहीं मिला। यह बुन्डीबुग्यो प्रकार का ईबोला वायरस है, जिसके लिए कोई मंजूरशुदा वैक्सीन या इलाज उपलब्ध नहीं है। कांगो में पहले भी ईबोला के 12 से ज्यादा आउटब्रेक आ चुके हैं। इस बार सुरक्षा, विस्थापन और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी के बीच यह लड़ाई और मुश्किल हो गई है।

 

असम विधानसभा में UCC बिल पेश होते ही हंगामा, आदिवासी समाज को कानून से मिली पूरी छूट

गुवाहाटी 

असम कैबिनेट की मंजूरी के ठीक दो हफ्ते बाद राज्य सरकार ने सोमवार को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश कर दिया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने सदन के पटल पर द यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम, बिल, 2026 पेश किया। इस बेहद अहम विधेयक पर 27 मई को चर्चा और इसे पारित किए जाने की संभावना है। हालांकि, विपक्षी विधायकों ने असम विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश किए जाने का विरोध किया है। विपक्ष का कहना है कि इसे प्रस्तुत करने से पहले हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा होनी चाहिए। 

इससे पहले 13 मई को मुख्यमंत्री सरमा के दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक हुई थी। तब सरकार ने घोषणा की थी कि 21 से 26 मई तक चलने वाले मौजूदा विधानसभा सत्र के दौरान यह कानून लाया जाएगा। कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि कैबिनेट ने समान नागरिक संहिता के मसौदे को मंजूरी दे दी है, जिसे सत्र के अंतिम दिन पेश किया जाएगा।

कानून के पांच मुख्य आधार
राज्य सरकार के मुताबिक, इस विधेयक के मसौदे को असम की विशिष्ट जनसांख्यिकीय विविधता और सामाजिक ताने-बाने के अनुकूल तैयार किया गया है। यह नया कानून मुख्य रूप से नागरिक समाज से जुड़े पांच बड़े मुद्दों को नियमित करेगा।

बहुविवाह का खात्मा: राज्य के भीतर बहुविवाह की प्रथा पर पूरी तरह कानूनी रोक लगेगी।

शादी की समान उम्र: विवाह के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र का एक तय मानक लागू होना।

तलाक और निकाह का पंजीकरण: सभी शादियों और तलाकों का सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होना अनिवार्य होगा।

बेटियों को बराबर का हक: पैतृक संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार।

लिव-इन का कानूनी हिसाब: बिना शादी के साथ रहने वाले जोड़ों यानी लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कड़े नियम और पंजीकरण अनिवार्य।

यूसीसी लागू करने वाला तीसरा राज्य बनेगा असम
यदि यह विधेयक पास हो जाता है, तो उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम देश में यूसीसी विधेयक पारित करने वाला तीसरा राज्य बन जाएगा। उत्तराखंड ने साल 2024 में यूसीसी लागू किया था। वह संविधान के नीति निदेशक तत्वों के तहत ऐसा कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बना था। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।

इस साल जनवरी में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में यूसीसी लागू होने का एक वर्ष पूरा होने पर इसकी सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि इस कानून ने महिलाओं को सशक्त बनाया है और उनकी सुरक्षा बढ़ी है। सीएम धामी ने कहा था कि यूसीसी को लेकर लोगों की तमाम शंकाएं और अफवाहें खत्म हो चुकी हैं। पांच लाख से अधिक मामलों में निजता के उल्लंघन का एक भी मामला सामने नहीं आया है। उत्तराखंड सरकार के मुताबिक, अब ऑनलाइन माध्यम से रिकॉर्ड संख्या में शादियां पंजीकृत हो रही हैं। महज एक साल में 4,74,447 विवाह ऑनलाइन पंजीकृत किए गए हैं। दूसरी ओर, गुजरात विधानसभा ने भी इसी साल मार्च में महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और समानता देने के उद्देश्य से यूसीसी विधेयक पारित किया है।

भाजपा का राष्ट्रव्यापी एजेंडा 
ये विधेयक देश भर में समान नागरिक संहिता लागू करने के भारतीय जनता पार्टी के लक्ष्य के अनुरूप हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल में मुर्शिदाबाद की रैली में कहा था कि तुष्टिकरण की राजनीति को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए पश्चिम बंगाल में भी यूसीसी लागू किया जाएगा। हाल ही में संपन्न असम विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 126 सदस्यीय विधानसभा में 82 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है। असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन में एनडीए की कुल सीटें 102 तक पहुंच गई हैं।

विपक्ष का कड़ा विरोध और सियासी सरगर्मी
सत्र की शुरुआत से ही इस विधेयक को लेकर विधानसभा के भीतर और बाहर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। सत्ता पक्ष का कहना है कि सरकार ने पहले ही सत्र में यूसीसी लाकर जनता से किया अपना सबसे बड़ा चुनावी वादा निभाया है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और राइजोर दल जैसे विपक्षी दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष ने कानून को लाने की टाइमिंग और इसके सामाजिक असर को लेकर सदन में विरोध दर्ज कराया है। 

आम आदमी को बड़ा झटका! पेट्रोल-डीजल फिर 2 रुपए महंगा, कई शहरों में कीमतें आसमान पर

नई दिल्ली
 सोमवार को ईंधन की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी की गई, जिससे पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 2.71 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई, जो दो सप्ताह से भी कम समय में चौथी बढ़ोतरी है।

इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 95.20 रुपये प्रति लीटर हो गई है।

प्रमुख शहरों में अब क्या है पेट्रोल की कीमत?
अगर बात करें भारत के प्रमुख शहरों में तेल की कीमतों की तो दिल्ली में 102.12 रुपये, कोलकाता में 113.51, मुंबई में 111.21, नोएडा में 101.9 रुपये, बेंगलुरु में 110.6 रुपये, भूवनेश्वर में 108.8 रुपये, चंडीगढ़ में 101.5 रुपये, जयपुर में 113.4 रुपये, लखनऊ में 101.9 रुपये, पटना में 113.5 रुपये प्रति लीटर है।

प्रमुख शहरों में अब क्या है डीजल की कीमत?
अगर बात करें भारत के प्रमुख शहरों में डीजल के कीमत की तो नई दिल्ली में 95.2 रुपये, कोलकाता में 99.8 रुपये, मुंबई में 97.8 रुपये, चेन्नई में 99.6 रुपये, गुड़गांव में 95.4 रुपये, नोएडा में 95.4 रुपये, बेंगलुरु में 98.5 रुपये, भुवनेश्वर में 100.6 रुपये, चंडीगढ़ में 89.5 रुपये, हैदराबाद में 103.8 रुपये, जयपुर में 98.4 रुपये, लखनऊ में 95.4 रुपये, पटना में 99.5 रुपेय प्रति लीटर है।

इस महीने यह चौथी बढ़ोतरी
ईंधन की कीमतों में इस महीने में यह चौथी बढ़ोतरी है। 25 मई को पेट्रोल ₹2.61 प्रति लीटर और डीजल ₹2.71 प्रति लीटर महंगा हो गया। इससे पहले 23 मई को पेट्रोल 87 पैसे, डीजल 91 पैसे महंगा किया गया था। जबकि, 19 मई को पेट्रोल और डीजल के दामों में एवरेज 90 पैसे की बढ़ोतरी की गई थी। 15 मई को भी कीमतों में ₹3 प्रति लीटर का भारी इजाफा किया गया था।

अधिकतर राज्यों में पेट्रोल 100 के पार
उत्तर प्रदेश में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत ₹102.76 और पश्चिम बंगाल में ₹114.20 पर पहुंच गई है। आंध्र प्रदेश में पेट्रोल ₹117.35 वहीं, असम में ₹106.21, मध्य प्रदेश में ₹115.77,बिहार में ₹114.79, राजस्थान में ₹113.93 प्रति लीटर पर पहुंच गया है। महाराष्ट्र में एक लीटर पेट्रोल की कीमत ₹113.05, दिल्ली में ₹102.11, छत्तीसगढ़ में ₹109.59, गुजरात में ₹102.92, हरियाणा में ₹103.57, हिमाचल प्रदेश में ₹101.64 और जम्मू और कश्मीर में ₹108.47 प्रति लीटर हो गई है।

झारखंड में 1 लीटर पेट्रोल का दाम आज से ₹107.02, केरल में ₹114.31, मणिपुर में ₹114.76, मिजोरम में ₹104.74,ओडिशा में ₹110.30, पंजाब में ₹105.90, सिक्किम में ₹109.88 हो गया है। वहीं, तेलंगाना में ₹116.78, त्रिपुरा में ₹104.89, उत्तराखंड में ₹100.96 एक लीटर पेट्रोल का दाम अब इस रेट पर है।

इन राज्यों में डीजल भी 100 के पार
mypetrolprice के मुताबिक आंध्र प्रदेश में डीजल की कीमत ₹10
5.92 पर पहुंच गई है। बिहार में भी कई शहरों में डीजल के दाम 100 रुपये लीटर के पार पहुंच गए हैं। अररिया में, औरंगाबाद, बांका, भागलपुर में डीजल 100 के पार है। छत्तीसगढ़ में डीजल के रेट 100 के पार पहुंच गया है। गुजरात के राजकोट में डीजल 100.01 रुपये लीटर है। झारखंड, केरल, मध्यप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के कुछ शहरों में डीजल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है।

क्यों बढ़ रहे पेट्रोल-डीजल के दाम
ईरान युद्ध के चलते तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सरकार के मुताबिक, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण घाटे में चल रही थीं। पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा के अनुसार, कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर हर महीने करीब ₹30,000 करोड़ का नुकसान हो रहा था।

चुनाव से पहले सरकार की कोशिशें
कीमतें स्थिर रखने के लिए सरकार ने पहले ही पेट्रोल और डीजल पर स्पेशल एक्साइज ड्यूटी में ₹10-10 प्रति लीटर की कटौती कर दी थी। पेट्रोल पर यह ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3, जबकि डीजल पर ₹10 से शून्य कर दी गई थी। केंद्र सरकार की ओर से पहले एक लीटर पेट्रोल पर कुल ₹21.90 एक्साइज ड्यूटी वसूली जाती थी, जो घटकर ₹11.90 रह गई। इसी तरह, डीजल पर कुल केंद्रीय उत्पाद शुल्क ₹17.8 से घटकर ₹7.8 पर आ गया। इसी निर्णय की वजह से पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़े थे।

पिछले शनिवार को बढ़ी थी कीमतें
पेट्रोल-डीजल की कीमतें पिछले शनिवार को बढ़ी थी, जब पेट्रोल की कीमत में 87 पैसे और डीजल की कीमत में 91 पैसे की वृद्धि की गई थी। शनिवार को ही दिल्ली में सीएनजी की कीमत में भी 1 रुपया प्रति किलोग्राम की वृद्धि के साथ 81.09 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई।

क्यों दोबारा बढ़ी ईंधन की कीमतें?
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज पर नियंत्रण कर लिया। जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो रही है। होर्मुज स्ट्रेट में ईरान द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है।

पिछले कई हफ्तों से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बावजूद भारत की तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल और डीजल को पुरानी कीमतों पर ही बेच रही थी। लेकिन पिछले दो हफ्तों से तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है।

अनुमानों के अनुसार, तीनों तेल और गैस कंपनियां – इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) – प्रतिदिन सामूहिक रूप से 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा उठा रही थीं। इसलिए, सरकार को कीमतें बढ़ानी पड़ीं।

कर्नाटक में फिर तेज हुई सत्ता बदलने की चर्चा, सिद्धारमैया दिल्ली तलब; DK के पोस्टरों ने बढ़ाई हलचल

बेंगलुरु 

कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान की खबरों के बीच अब कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाया है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को 26 मई यानी मंगलवार को दिल्ली पहुंचने का फरमान जारी किया गया है। चर्चा है कि यहां सिद्धारमैया और पार्टी आलाकमान के बीच बंद कमरे में एक अहम बैठक होगी।

इससे पहले सिद्धारमैया ने कहा था कि वे सिर्फ आलाकमान के बुलाने पर ही दिल्ली जाएंगे। वहीं, डीके शिवकुमार ने हाल ही में कहा है कि आलाकमान जो भी फैसला करेगा, दोनों नेता उसका पूरी तरह पालन करेंगे। ऐसे में यह बैठक कर्नाटक कांग्रेस के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। इससे CM पद को लेकर जारी सस्पेंस भी खत्म हो सकता है।

गौरतलब है कि यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के 3 साल पूरे कर लिए हैं। इससे पहले सरकार बनने के समय से ही चर्चा है कि सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच पावर-शेयरिंग का फॉर्मूला तय हुआ था। इसके बाद जब सरकार ने ढाई साल पूरे किए, तब से ही शिवकुमार का खेमा लगातार उनको CM बनाने की मांग कर रहा है। बीते साल नवंबर में तनाव तब चरम पर पहुंच गया था जब शिवकुमार ने खुलकर अपनी मांग सामने रखी थी।

डीके शिवकुमार के लिए लगे पोस्टर्स
अब एक बार फिर कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में मैसूर में शिवकुमार के जन्मदिन के जश्न के दौरान उनके समर्थकों ने खास केक काटा, जिस पर लिखा था- ‘नेक्स्ट सीएम डी के बॉस’, यानी ‘अगले मुख्यमंत्री डीके बॉस।’ वहीं राजधानी बेंगलुरु से लेकर बेलगावी तक, पूरे कर्नाटक में शिवकुमार के बड़े-बड़े पोस्टरों और कट-आउट्स भी लगाए गए हैं जिनमें ऐसे ही नारे लिखे हैं।
दिल्ली दरबार में किन मुद्दों पर होगी बातचीत?

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस सूत्रों ने बताया है कि दिल्ली में होने वाली बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेता शामिल हो सकते हैं। इस दौरान दोनों गुटों के बीच जारी तनाव को कम करने की कोशिश की जाएगी। वहीं राज्य में कैबिनेट में भी बड़े फेरबदल पर चर्चा होने की संभावना है। सरकार के 3 साल पूरे होने पर कई मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है और नए और युवा चेहरों को मौका दिया जा सकता है, ताकि दोनों गुटों के विधायकों को संतुष्ट रखा जा सके।

फाल्टा में BJP की जीत का राज क्या? मुस्लिम वोट भी मिले या हिंदू वोटों का हुआ ध्रुवीकरण

कलकत्ता

पश्च‍िम बंगाल के फाल्टा व‍िधानसभा चुनाव का नतीजा आया और सब शॉक्‍ड रह गए. क्‍योंक‍ि यह सिर्फ एक सीट का रिजल्ट नहीं, मुस्‍ल‍िमों के वोट बैंक को अपना हक समझने वाली पार्टियों के ल‍िए मैसेज है. क्‍योंक‍ि यहां कुल वोट पड़े 2,10,192… और इसमें से 72% वोट अकेले बीजेपी के कैंड‍िडेट को म‍िल गए. सवाल ये क‍ि जब हिंदू आबादी यहां करीब 63से 65% के आसपास है, तो बीजेपी को 71% वोट कैसे मिल गए? व‍िपक्ष इसे ध्रुवीकरण कह सकता है, लेकिन नतीजे बताते हैं क‍ि या तो बीजेपी को एक-एक ह‍िन्‍दू वोट म‍िल गए और व‍िपक्ष को स‍िर्फ मुसलमानों के वोट म‍िले, एक भी ह‍िन्‍दू ने वोट नहीं क‍िया और या फ‍िर तमाम मुसलमानों ने भी खुलकर बीजेपी को सपोर्ट क‍िया. लेकिन असली कहानी इतनी सीधी नहीं है । 

फाल्टा विधानसभा में इस बार र‍िकॉर्ड 87% वोट‍िंग हुई थी. यानी लोगों ने इस बार वोट डालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. ये भी नहीं कह सकते क‍ि मुस्‍ल‍िम वोटर घर से नहीं न‍िकले. अब नतीजा भी देख लीजिए. वोटिंग पैटर्न को देखें तो यह मुकाबला कई उम्मीदवारों के बीच था, लेकिन असल बढ़त बीजेपी को तब मिली जब मैदान में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा होता दिखाझ बीजेपी ने लगभग हर बूथ पर मजबूत प्रदर्शन किया और बड़े वोट शेयर में तब्दील किया। 

क‍िसे क‍ितने वोट म‍िले

बीजेपी: 149666 वोट (71.2%)
सीपीएम: 40645 वोट (19.34%)
कांग्रेस: 10084 वोट (4.8%)
टीएमसी: 7778 वोट (3.7%)
अन्य/NOTA: बाकी हिस्सा

आप सोच रहे होंगे क‍ि इसमें क्‍या खास है. लेकिन ठहरिए! असली पेंच यहीं छुपा है. फाल्टा विधानसभा में हिंदू मतदाता करीब 62 से 65% हैं और मुस्लिम मतदाता लगभग 34% से 36% के बीच हैं। 

गणित के सामान्य नियम से भी देखें, तो अगर 100% हिंदू बीजेपी को वोट दे देता, जो कि आज तक कभी नहीं हुआ, तब भी बीजेपी का आंकड़ा 62-65% पर आकर थम जाना चाहिए था. लेकिन देवांग्शु पांडा को मिले हैं 71.2% वोट! यानी सीधे-सीधे हिंदू आबादी के कुल अनुपात से भी 10% से 11% ज्यादा वोट। 

तो क्या फाल्टा के मुस्लिमों ने भी चुपके से कमल के बटन पर उंगली दबाई? या फिर कांग्रेस और लेफ्ट का वोट बैंक पूरी तरह मटियामेट होकर बीजेपी में समा गया? और सबसे बड़ा सस्पेंस… दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान को सिर्फ 3.7% वोट क्यों मिले?

खेल हुआ कैसे? 

तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने ऐन वक्त पर मुकाबले से अपना नाम वापस ले लिया था या यूं कहें कि वे चुनावी रेस से तकनीकी या राजनीतिक कारणों से बाहर हो गए. लेकिन चूंकि तब तक बैलट पेपर प्रिंट हो चुके थे और ईवीएम सेट हो चुकी थी, इसलिए उनका नाम और सिंबल ‘दो फूल’ मशीन पर मौजूद रहा. नतीजा? मैदान में न होने के बावजूद जहांगीर खान के नाम पर 7,783 वोट (3.7%) पड़ गए. इसमें दिलचस्प बात ये है कि उन्हें ईवीएम से सिर्फ 6,257 वोट मिले, लेकिन पोस्टल बैलट से 1,526 वोट मिले, जो दिखाता है कि सरकारी कर्मचारियों या ड्यूटी पर तैनात लोगों का एक हिस्सा आंख मूंदकर टीएमसी के नाम पर बटन दबा गया। 

दीदी के कैंडिडेट का मैदान से हट जाना ही इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट बना. डायमंड हार्बर जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट के तहत आने वाले फाल्टा में टीएमसी का जमीन पर सक्रिय न होना एक बड़ा वैक्यूम पैदा कर गया. जब सत्ताधारी दल का मुख्य चेहरा ही गायब हो गया, तो टीएमसी का जो कोर वोटर था-विशेषकर मुस्लिम आबादी और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी… वे पूरी तरह असमंजस में आ गए। 

जहां पुरानी थ्योरी फेल हो गई
फाल्टा विधानसभा मुख्य रूप से एक ग्रामीण इलाका है. इसके सामाजिक ढांचे को समझने के लिए हमें इसके डेमोग्राफी के आंकड़ों को देखना होगा। 

    धार्मिक समीकरण: इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 52% से 65% के बीच है. वहीं मुस्लिम मतदाताओं की आबादी काफी निर्णायक है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 34% से 36% (कुछ अनुमानों में 38% तक) हिस्सा बनाती है. हासिमनगर, गोपालपुर, फतेहपुर, और भदुरा जैसे क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से टीएमसी की मजबूत पकड़ रही है। 
    जातीय समीकरण (SC फैक्टर): धार्मिक विभाजन के अलावा, यहां की स्थानीय जातियों में अनुसूचित जाति (SC) का बहुत बड़ा प्रभाव है. 2011 की जनगणना और मतदाता सूची के विश्लेषण के अनुसार, फाल्टा विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या लगभग 25.66% है. स्थानीय ग्रामीण अंचलों और गांवों (जैसे फाल्टा गांव) में कई जगह SC आबादी 80% से भी अधिक है. शेष लगभग 33% से 35% आबादी सामान्य और अन्य पिछड़ी जातियों जैसे कि महिष्य, सद्गोप व अन्य बंगाली हिंदू समुदाय की है। 

तो क्या मुस्लिमों ने भी बीजेपी को वोट दिया?

पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक धारणा बहुत मजबूत है कि मुस्लिम समुदाय कभी भी किसी भी परिस्थिति में बीजेपी को वोट नहीं देता. लेकिन फाल्टा में परिस्थितियां बिल्कुल जुदा थीं. जब टीएमसी का उम्मीदवार मैदान में सक्रिय नहीं था, तो मुस्लिम मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि उनका पारंपरिक ठिकाना गायब था. उनके पास दो ही रास्ते बचे थे या तो वे कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला या सीपीआई(एम) के शंभू नाथ कुर्मी की तरफ जाएं, या फिर स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का हिस्सा बन जाएं .

आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को मात्र 10,084 वोट (4.8%) मिले और सीपीआई(एम) को 40,645 वोट (19.34%) मिले. अगर मुस्लिम आबादी ने एकमुश्त लेफ्ट या कांग्रेस को वोट दिया होता, तो इन दोनों पार्टियों का योग बहुत बड़ा होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ग्राउंड रिपोर्ट इशारा करती है कि मुस्लिम बहुल पॉकेट्स (जैसे हासिमनगर और फतेहपुर) के कुछ हिस्सों में, विशेषकर युवा मुस्लिम मतदाताओं ने, रोजगार, स्थानीय विकास और केंद्रीय योजनाओं के प्रभाव में आकर पहली बार ‘कमल’ का बटन दबाया. हालांकि यह कोई सामूहिक बदलाव नहीं था, लेकिन इस ‘साइलेंट शिफ्ट’ ने बीजेपी के वोट शेयर को अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंचा दिया .

हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

71.2% के जादुई आंकड़े के पीछे की जो दूसरी और सबसे सटीक थ्योरी है वह है हिंदू वोटों का शत-प्रतिशत कंसॉलिडेशन. जब किसी क्षेत्र में 87% मतदान होता है, तो इसका मतलब है कि सामान्य तौर पर घर पर बैठने वाला या न्यूट्रल रहने वाला वोटर भी पोलिंग बूथ तक पहुंचा है. फाल्टा की सामान्य जातियों (जैसे महिष्य समुदाय) और 25.66% दलित (SC) आबादी के बीच एक जबरदस्त राजनीतिक लामबंदी देखी गई. टीएमसी के स्थानीय नेताओं के खिलाफ जो गुस्सा था, वह इस चुनाव में ज्वालामुखी बनकर फटा. पारंपरिक रूप से जो हिंदू वोटर पहले लेफ्ट फ्रंट (CPIM) को वोट करता था, उसने इस बार अपना वोट खराब न करते हुए सीधे बीजेपी के देवांग्शु पांडा के पक्ष में ट्रांसफर कर दिया ताकि टीएमसी को करारी शिकस्त दी जा सके. यही कारण है कि सीपीआई(एम) का उम्मीदवार मजबूत काडर होने के बावजूद 19.34% पर सिमट गया .

ममता और राहुल के लिए यह शॉकिंग क्यों है?

ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका: डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र को टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता है. उनके ठीक बगल की विधानसभा सीट फाल्टा पर टीएमसी का इस तरह वॉकओवर दे देना और बीजेपी का 71% से ज्यादा वोट पा जाना यह दिखाता है कि सत्ताधारी दल का जमीनी संगठन अति-आत्मविश्वास या आंतरिक कलह का शिकार है. अगर दीदी का वोटर उनके उम्मीदवार के न होने पर लेफ्ट या कांग्रेस के बजाय सीधे बीजेपी की तरफ देख रहा है, तो यह 2026 के बाद की राजनीति के लिए खतरे का सायरन है .

राहुल गांधी के लिए बड़ा सबक: कांग्रेस ने यहां अब्दुर रज्जाक मोल्ला जैसे पुराने चेहरे को उतारा था, लेकिन जनता ने उन्हें पूरी तरह नकार दिया. राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’ और बड़े-बड़े दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर कांग्रेस पश्चिम बंगाल में केवल 4.8% वोटों पर सिमट कर रह गई है. अल्पसंख्यक बहुल माने जाने वाले इस क्षेत्र में भी कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रही .

 

सड़क पर नमाज को लेकर बढ़ा विवाद, मौलाना साजिद रशीदी की ‘थूक-पेशाब’ वाली दलील चर्चा में

नई दिल्ली
ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन (AIIA) के प्रमुख मौलाना साजिद रशीदी ने सड़क पर नमाज को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान का समर्थन किया है। रशीदी ने शिफ्ट में नमाज को जायज बताते हुए कहा कि सड़क नापाक होती है और इसलिए वहां मुसलमानों के इबादत नहीं करनी चाहिए। रशीदी ने कहा कि सड़क पर जानवर भी चलते हैं और लोग थूकते, पेशाब भी करते हैं। उन्होंने मुसलमानों को उकसाने का आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ पार्टियां उन्हें पिटवाना चाहती हैं।

एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में मौलाना रशीदी ने सड़क पर नमाज ना पढ़ने की सीएम योगी की हिदायत का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘योगी जी का बयान बिलकुल सही है। हमने कोरोना काल में भी नमाजे शिफ्ट में पढ़ी है। उन्हें पता है कि शिफ्ट में नमाज हो सकती है, इसलिए उन्होंने ऐसा बयान दिया है। पूरे देश और प्रदेश में किसी मौलवी ने उनका खंडन नहीं किया। कोई खंडन कर रहा है तो वह कांग्रेस-सपा के लोग या उनसे जुड़े नेता। उनको पता नहीं दीन के बारे में कि नमाज शिफ्ट में भी पढ़ने का प्रावधान है।’

मौलाना साजिद रशीदी ने इस्लाम के दो सिद्धांतों का जिक्र करते हुए बताया कि क्यों सड़क पर नमाज पढ़ना जायज नहीं है। उन्होंने कहा, ‘इस्लाम का बुनियादी सिद्धांत है कि नमाज नापाक जगह पर नहीं पढ़ी जा सकती है। सड़क पाक नहीं हो सकती है, कैसे पाक होगी जब उस पर लोग, जानवर चलते हैं, थूकते हैं और पेशाब भी करते हैं। सबकुछ होता है तो कैसे नमाज होगी। दूसरा सिद्धांत यह है कि वह मुसलमान नहीं हो सकता है जिससे किसी दूसरे को तकलीफ पहुंचे। अगर आप सगर जाम कर रहे हैं तो तकलीफ होती है लोगों को। एंबुलेंस फंस रही है, किसी को कहीं जाना है।’

अपराध में शामिल थे मुसलमान: रशीदी
मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि कुछ समय पहले तक अधिकतर मुसलमान अपराधों में लिप्त थे, लेकिन भाजपा सरकार आने के बाद अब वे शिक्षा की राह पर जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘कुछ साल पहले तक तो मुसलमान गोली भी चलाता था, डकैत भी था। कैराना (पश्चिमी यूपी का एक इलाका) का तो पूरा क्षेत्र इसी में लगा था। 60-70 फीसदी यही करते थे। आज है कोई? अब मुसलमान ने सोच लिया है कि सही जिंदगी जीने का तरीका शिक्षा है।’ रशीदी ने कहा कि पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जो फ्री हैंड दिया था मुसलमानों को उससे कई कमियां आ गईं। उससे मुसलमानों का भला नहीं हुआ, शिक्षा से दूर हो गए। रोजगार छोड़ दिया, लूट-पाट वाली बुराइयां आ गईं। आज मुसलमान 15-20 साल से और जब से भाजपा सरकार आई है मुसलमानों ने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया है। चाहे गरीब मजदूर है वह भी पढ़ा रहा है।

बुलडोजर ऐक्शन पर क्या कहा
रशीदी ने कहा कि बुलडोजर ऐक्शन उन लोगों के खिलाफ ही हो रहा है जो गलत काम में शामिल होते हैं। उन्होंने कहा, ‘जब मैं रेप, चोरी, डकैती, बदमाशी में नहीं पकड़ा जाऊंगा तो क्यों बुलडोजर चलेगा। बुलडोजर तो उस पर चलता है ना जो गलती करता है। मुसलमानों की खैर इसी में है कि सही रास्ते पर चलें। पहले कोई मुसलमान लड़का थाने में आ गया तो नेता का फोन आता था कि इसे छोड़ दो हमारा आदमी है। वह बाहर निकल कर एक और मर्डर करता था, एक और करता था, कातिल बन जाता था। बदमाश बन जाता था, उसे पीछे से समर्थन था। आज तो सीधा एनकाउंटर है। कौन बदमाशी करेगा। अक्लमंदी इसी में है कि हवा के खिलाफ मत चलो।’ सपा से जुड़े एक सवाल पर रशीदी ने कहा कि, हमें नहीं चाहिए ऐसी पार्टी जिसका मकसद यह हो कि मुसलमान नमाज के लिए सड़क पर उतरे, उनकी पिटाई हो, मुकदमे लगे, जेल जाएं और उनके घर टूटे। अखिलेश यादव बनवा देंगे घर किसी का। आजम खान को तो बचा नहीं पाए।

बकरीद के चलते CUET UG परीक्षा टली, 28 मई का एग्जाम अब नई तारीख पर होगा

 लखनऊ
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने कामन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (यूजी) के तहत 28 मई को होने वाली परीक्षा को ईद-उल-अजहा (बकरीद) के चलते स्थगित कर दिया है। यह परीक्षा दो पालियों में आयोजित की जानी थी। अब जल्द ही इसकी नई तिथि घोषित की जाएगी। इसकी सूचना रविवार को एनटीए ने अपनी वेबसाइट पर जारी की है।

अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे एनटीए की अधिकारिक वेबसाइट (https://nta.ac.in) और https://cuet.nta.nic.in/) को नियमित रूप से देखते रहें।

क्यों टाली गई परीक्षा
NTA के मुताबिक, सरकार की ओर से ईद-उल-जुहा (बकरीद) की छुट्टी की तारीख में बदलाव किया गया है. इसी को ध्यान में रखते हुए 28 मई 2026 को होने वाली CUET-UG परीक्षा की दोनों शिफ्ट्स को स्थगित कर दिया गया है। 

दोनों शिफ्ट्स प्रभावित
एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि 28 मई को निर्धारित सुबह और दोपहर दोनों शिफ्ट्स की परीक्षाएं अब नहीं होंगी. इस दिन परीक्षा देने वाले सभी उम्मीदवारों पर यह फैसला लागू होगा. न्यूज एजेंसी ANI ने भी इस जानकारी अपने एक्स हैंडल से शेयर किया है। 

नई तारीख का इंतजार
NTA ने कहा है कि प्रभावित उम्मीदवारों के लिए नई परीक्षा तिथि जल्द घोषित की जाएगी. छात्रों को सलाह दी गई है कि वे नियमित रूप से आधिकारिक वेबसाइट चेक करते रहें, ताकि उन्हें ताजा अपडेट मिल सके। 

क्या है CUET-UG परीक्षा
CUET-UG (कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट) देशभर में आयोजित होने वाली एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है. इसके जरिए केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों समेत 280 से ज्यादा संस्थानों में स्नातक कोर्स में दाखिला मिलता है। 

आधिकारिक नोटिस भी जारी
NTA ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश भी जारी किया है, जिसमें 22 मई के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के मेमोरेंडम का हवाला दिया गया है. साथ ही छात्रों को हेल्पलाइन नंबर और ईमेल के जरिए सहायता लेने की सुविधा भी दी गई है.

शेयर बाजार में तूफानी शुरुआत! सेंसेक्स 800 अंक उछला, निफ्टी ने भी भरी रफ्तार

मुंबई 

भारतीय शेयर बाजार सप्ताह के पहले दिन सोमवार को खुलने के साथ ही बमबम नजर आ रहा है और दोनों इंडेक्स तूफानी तेजी के साथ ओपनिंग करने के बाद रॉकेट की रफ्तार से भागते हुए दिख रहे हैं. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स खुलते ही जहां 800 अंकों से ज्यादा की धुआंधार तेजी लेकर 76000 के स्तर को पार कर गया. तो वहीं दूसरी ओर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी इंडेक्स भी सेंसेक्स के कदम से कदम मिलाकर करीब 250 अंकों की जोरदार बढ़त के साथ कारोबार करता दिखा। 

खास बात ये है कि तेल कंपनियों ने देश में लगातार चौथी बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी (Petrol-Diesel Price Hike) का झटका दिया है, इसके बाद भी विदेशी कारणों की वजह से बाजार रफ्तार पकड़े हुए नजर आ रहा है।  

सेंसेक्स-निफ्टी ने मचाया गदर
शेयर मार्केट में कारोबार की शुरुआत होने से पहले ही प्री-ओपनिंग सेशन में सेंसेक्स-निफ्टी में जोरदार तेजी के संकेत मिल गए थे. वहीं जब ट्रेडिंग शुरू हुई, तो BSE Sensex खुलते ही 76,000 का स्तर पार कर गया. ये इंडेक्स अपने पिछले शुक्रवार के बंद 75,415 की तुलना में जोरदार रफ्तार पकड़ते हुए 76,135 पर ओपन हुआ और महज पांच मिनट के कारोबार में ही 874 अंक उछलकर 76,289 पर जा पहुंचा। 

बात NSE Nifty की करें, तो इसकी चाल भी सेंसेक्स के जैसी ही नजर आई. 50 शेयरों वाला ये इंडेक्स अपने पिछले बंद 23,719 के मुकाबले चढ़कर 23,940 के लेवल पर खुला और फिर सेंसेक्स की तरह रॉकेट की रफ्तार से भागते हुए 23,984 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। 

शेयर बाजार में तेजी के तीन कारण
बात करें, सोमवार को शेयर मार्केट रैली के पीछे के बड़े कारणों के बारे में, तो एक नहीं बल्कि तीन-तीज वजह हैं. इनका सीधा कनेक्शन डोनाल्ड ट्रंप से भी है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान युद्ध खत्म किए जाने और दुनिया की तेल जरूरत को पूरा करने में अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से जल्द खोले जाने के सिग्नल दिए हैं। 

बाजार का सेंटीमेंट बदलने में दूसरा कारण भी इससे जुड़ा हुआ है, क्योंकि ट्रंप के ईरान-अमेरिका के बीच सुलह के संकेतों का सबसे बड़ा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर दिखा, जो इस ग्लोबल टेंशन के बीच दुनिया को डरा रही थीं और महंगाई बढ़ाने में अहम रोल निभा रही थीं. सोमवार को Brent Crude Price 100 डॉलर के नीचे आ गया, जिससे महंगाई कम होने की उम्मीद बढ़ी। 

तीसरा कारण भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर आया अपडेट है. दरअसल, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि India-US Trade Deal को जल्द अंतिम रूप दिया जा सकता है. यह समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा. बता दें रूबियो चार दिवसीय भारत दौरे पर हैं। 

ये 10 शेयर बने मार्केट ‘हीरो’
शेयर बाजार में तूफानी तेजी के बीच सबसे ज्यादा भागने वाले स्टॉक्स की बात करें, तो बीएसई लार्जकैप कैटेगरी में शामिल M&M Share (2.90%), HDFC Bank Share (2.30%), IndiGo Share (2.10%) की तेजी के साथ ट्रेड कर रहे थे. वहीं दूसरी ओर मिडकैप में शामिल Hindustan Petroleum Share (4.20%), Ashok Leyland Share (3.60%), AU Bank Share (2.30%) की तेजी में नजर आए। 

इसके अलावा स्मॉलकैप कंपनियों में NH Share (6%), Cohance Share (4.20%), IIFL Share (3%) और Inox Wind Share (2.50%) की उछाल के साथ कारोबार कर रहे थे। 

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