डिनर से कोलोसियम तक दिखी मोदी-मेलोनी की बॉन्डिंग, 4 साल में 7 मुलाकातों से बदले भारत-इटली रिश्ते

 नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को इटली पहुंचे। रोम पहुंचने के बाद उन्हें PM जॉर्जिया मेलोनी से मुलाकात की। PM मोदी ने X पर पोस्ट कर बताया कि दोनों नेताओं ने साथ में डिनर भी किया। इस दौरान कई अहम मुद्दों पर बातचीत की। इसके बाद मोदी और मेलोनी ने रोम के ऐतिहासिक कोलोसियम का दौरा भी किया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया पर मोदी के साथ तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ‘वेलकम टु रोम, माय फ्रेंड।’

PM मोदी ने कहा कि आज होने वाली औपचारिक बातचीत में भारत-इटली दोस्ती को और मजबूत करने पर चर्चा जारी रहेगी। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, निवेश, एडवांस टेक्नोलॉजी और वैश्विक मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मोदी इटली में कई अहम कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान वे इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मातारेला से भी मुलाकात करेंगे।

अपनी पांच देशों की यात्रा के आखिरी पड़ाव पर मंगलवार को वह रोम पहुंचे, जहां इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. मेलोनी ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “Welcome my friend .”

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी और इटली पीएम मेलोनी की मुलाकातें औपचारिक कूटनीतिक मुलाकातों से कहीं ज्यादा अहमीयत रखता है. पिछले कुछ वर्षों में दोनों नेताओं ने भारत-इटली संबंधों को एक नई दिशा दी है. कभी सीमित व्यापारिक रिश्तों तक सिमटे दोनों देशों के संबंध अब रक्षा, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, AI और ग्लोबल सप्लाई चेन जैसे बड़े रणनीतिक मुद्दों तक पहुंच चुके हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी रोम पहुंचते ही अपना एजेंडा भी बताया. उन्होंने एक एक्स पोस्ट में बताया, “इस दौरे में भारत और इटली के बीच सहयोग को कैसे मजबूत किया जाए, इस पर फोकस किया जाएगा, जिसमें इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) पर खास ध्यान दिया जाएगा। 

मोदी-मेलोनी की पहली मुलाकात बाली में
इस नई साझेदारी की शुरुआत नवंबर 2022 में इंडोनेशिया के बाली में हुए G20 शिखर सम्मेलन से मानी जाती है. उस वक्त मेलोनी हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री बनी थीं. दोनों नेताओं की पहली मुलाकात में यह साफ हो गया था कि भारत और इटली नए दौर की शुरुआत करना चाहते हैं. इसी बैठक में ग्रीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और इटैलियन मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की भारत में भागीदारी बढ़ाने पर सहमति बनी। 

भारत-इटली में स्ट्रेटेजिक पार्टनर्शिप
इसके बाद मार्च 2023 में मेलोनी भारत आईं और रायसीना डायलॉग में चीफ गेस्ट बनीं. यही वह मोड़ था जहां दोनों देशों के रिश्तों को आधिकारिक तौर पर “स्ट्रेटेजिक पार्टनर्शिप” का दर्जा मिला. इस दौरान रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इसके तहत दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यास, सिक्योर इंटेलिजेंस शेयरिंग और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. इटली की बड़ी रक्षा कंपनियों को भारत में सैन्य उपकरणों के को-प्रोडक्शन का रास्ता भी खुला। 

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर का हिस्सा इटली
सितंबर 2023 में नई दिल्ली में हुए G20 सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के रिश्ते एक और स्तर ऊपर पहुंच गए. इटली भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर यानी IMEC का हिस्सा बना. इस कॉरिडोर का मकसद भारत को यूरोप से जोड़ने वाला नया व्यापारिक और समुद्री नेटवर्क तैयार करना है. इसी दौरान माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट भी फाइनल हुआ, जिससे भारतीय छात्रों, रिसर्चर्स और स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए इटली में अवसर बढ़े। 

AI, स्पेस टेक्नोलॉजी, क्रिटिकल मिनरल्स पर करार
जून 2024 में इटली में आयोजित G7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की फिर मुलाकात हुई. यहां बातचीत का फोकस भविष्य की टेक्नोलॉजी पर रहा. दोनों देशों ने AI, स्पेस टेक्नोलॉजी, क्रिटिकल मिनरल्स, टेलीकॉम और क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन को लेकर सहयोग बढ़ाने का फैसला किया. साथ ही इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी राइट्स यानी पेटेंट और डिजाइन से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए। 

जी-20 में मेलोनी-मोदी की मुलाकात
इसके बाद नवंबर 2024 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में हुए G20 सम्मेलन में दोनों देशों ने 2025-2029 के लिए फाइव ईयर जॉइंट स्ट्रैटेजिक एक्शन प्लान लॉन्च किया. यह अब तक का सबसे बड़ा रोडमैप माना गया, जिसमें रक्षा, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, शिक्षा, व्यापार और वैश्विक सहयोग समेत 10 बड़े सेक्टर शामिल किए गए। 

नवंबर 2025 में साउथ अफ्रीका के जोहोन्सबर्ग में हुए G20 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की मुलाकात में आतंकवाद के खिलाफ एक बेहद अहम समझौता हुआ. दोनों देशों ने “इंडिया-इटली जॉइंट इनीशियेटिव टू काउंटर फाइनेंसिंग ऑफ टेररिज्म” लॉन्च किया, जिसका मकसद आतंकवादी संगठनों की फंडिंग पर लगाम लगाना था। 

दिल्ली में हुए हाई-प्रोफाइल आतंकी हमले के बाद मेलोनी ने भारत के साथ खुलकर एकजुटता दिखाई थी. इस पहल के तहत दोनों देशों ने आतंकियों को मिलने वाली अवैध फंडिंग और क्रॉस-बॉर्डर वित्तीय नेटवर्क को रोकने, संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर निगरानी बढ़ाने और एफएटीएफ और ग्लोबल काउंटरटेररिज्म फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपसी तालमेल मजबूत करने पर सहमति जताई। 

“इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर” पर करार
अब मई 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की यह रोम यात्रा दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा करने वाली मानी जा रही है. इस दौरान “इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर” की अवधारणा को औपचारिक रूप दिया गया है. इसका मकसद हिंद महासागर से लेकर यूरोप तक समुद्री व्यापार और रणनीतिक कनेक्टिविटी को मजबूत करना है. साथ ही AI को लेकर भी बड़ा समझौता हुआ है, जिसमें इटली के “एल्गोर-एथिक्स” मॉडल और भारत की “ह्युमन सेंट्रिक एआई” सोच को साथ लाने की कोशिश की गई है। 

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और इटली की यह बढ़ती नजदीकी सिर्फ दो देशों के रिश्तों की कहानी नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत भी है. एक तरफ भारत यूरोप में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है, वहीं इटली एशिया में भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार के रूप में देखता है। 

चारधाम यात्रा में 30 दिन में 55 मौतें, क्या हाई अल्टीट्यूड बन रहा है सबसे बड़ा खतरा?

देहरादून 

उत्तराखंड में इस बार चारधाम यात्रा 19 अप्रैल को शुरू हुई थी. यानि इस यात्रा को 30 दिन पूूरे हो चुके हैं. इस दौरान आधिकारिक तौर पर यात्रा में शामिल 55 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. ज़्यादातर मौतों की मुख्य वजह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, विशेषकर दिल की बीमारियां और ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां। 

इसमें 30 लोगों की मृत्यु केदारनाथ यात्रा के रास्ते में हुई तो 10 लोगों की मौत बदरीनाथ यात्रा के दौरान हुई तो यमनोत्री और गंगोत्री धाम के रास्ते में 8 और 7 मौतों का आंकड़ा बताया जा रहा है। 

उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार चार धाम यात्रा में मौतों में 70–75% तक मामले खराब स्वास्थ्य यानि प्री‑एक्सिस्टिंग हार्ट डिज़ीज, हाई ब्लडप्रेसर, डायबिटीज, पल्मोनरी एडिमा आदि के कारण होते हैं. कई वृद्ध यात्री या फिटनेस कम वाले लोग ऊंचाई, थकान और तनाव के कारण अचानक हार्ट अटैक, स्ट्रोक या फेफड़ों में सूजन से मर जाते हैं। 

आमतौर पर लोग यहां के चार धामों की यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करते हैं. इसके लिए रजिस्ट्रेशन कराना होता है. चूंकि ये यात्रा हाई अल्टीट्यूड पर ही ज्यादा होती है, लिहाजा लोगों को हृदय संबंधी दिक्कतों से भी जूझना होता है. सलाह दी जाती है कि हृदय संबंधी दिक्कतों वाले इन यात्राओं से बचें. आगे ये जानेंगे कि आखिर ऊंचाई वाली जगहें क्यों दिल संबंधी बीमारियों वालों के लिए जानलेवा भी बन जाती हैं। 

उत्तराखंड के चारों धाम ऊंचाई वाली जगहों पर ही हैं. सभी पहाड़ों की ऊंचाई पर हैं, उनमें मौसम भी ठंडा और बर्फीला रहता है, चाहे यमुनोत्री हो या फिर बद्रीनाथ. वहां गर्मी के मौसम में भी इर्द गिर्द के पहाड़ों पर बर्फ ढंकी नजर आती है. लेकिन ऊंचाई वाली जगहें कैसे हृदय स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। 

अधिक ऊंचाई पर रहना अगर उन व्यक्तियों के लिए फायदेमंद होता है, जिनका हृदय स्वास्थ्य अच्छा होता है. तो उन लोगों के लिए खतरनाक जो मौजूदा तौर पर हृदय जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हों. बहुत से श्रद्धालु बिना पहले से डॉक्टरी जांच, फिटनेस टेस्ट या ऊंचाई के अनुकूलन के बिना सीधे चार धाम के लिए निकल पड़ते हैं। 

हाई अल्टीट्यूड यानि उच्च ऊंचाई किसे माना जाता है?
– समुद्र तल से 6,560 फीट से नीचे का कोई भी स्थान कम ऊंचाई वाला माना जाता है. इससे ऊपर की यात्रा मध्यम ऊंचाई और उच्च ऊंचाई वाली मानी जाती है. समुद्र तल से 6,560 से 9,840 फीट के बीच वाले स्थानों को मध्यम ऊंचाई वाला माना जाता है. समुद्र तल से 9,840 फीट से ऊपर की जगहें उच्च ऊंचाई वाली होती हैं. ये वो जगहें हैं जहां आपका शरीर ऊंचाई से संबंधित महत्वपूर्ण प्रभावों का अनुभव करने लगता है। 

भारत में हाई अल्टीट्यूड एरिया के पैरामीटर्स क्या हैं?

– भारतीय सेना उच्च ऊंचाई (एचए) क्षेत्रों को 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर के क्षेत्रों के रूप में परिभाषित करती है। इन्हें ऊंचाई के आधार पर तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है:

स्टेज I: 9,000–12,000 फीट (2,750–3,657 मीटर)
चरण II: 12,000-15,000 फीट (3,657-4,572 मीटर)
चरण III: 15,000 फीट से ऊपर (4,572 मीटर)

चार धाम की यात्रा किन ऊंचाइयों से गुजरती है?
– छोटा चार धाम के दर्शन के लिए 4000 मीटर से भी ज्‍यादा ऊंचाई तक की चढ़ाई करनी होती है. इसमें कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें होती हैं तो कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें. इसलिए ये यात्रा मुश्किल मानी जाती है। 

चार धाम यात्रा गढ़वाल हिमालय में ऊंचाई पर होती है, इसलिए इसे उच्च ऊंचाई वाली यात्रा कहा जाता है. चार धाम यात्रा के चार तीर्थस्थल इन ऊंचाइयों पर हैं. भारतीय सेना के हाई अल्टीट्यूड वाले पैरामीटर्स के हिसाब से भी ये सारी जगहें हाई अल्टीट्यूड एरिया हैं। 

यमुनोत्री: 3,291 मीटर
गंगोत्री: 3,415 मीटर
केदारनाथ: 3,553 मीटर
बद्रीनाथ: 3,300 मीटर
केदारनाथ: 11,700 फीट
गंगोत्री: 10,200 फीट

हाई अल्टीट्यूड वाले इलाके आमतौर पर कैसे होते हैं?
– उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आमतौर तापमान काफी ठंडा होता है. ज्यादा बारिश होती है, तेज हवाएं चलती हैं. कम वायु दबाव होता है और हवा में ऑक्सीजन का स्तर भी कम होने लगता है। 

इस ऊंचाई के लिए कई तरह के दिशा निर्देश दिए जाते हैं
1. धीरे-धीरे चढ़ो
2. एक दिन में कम ऊंचाई से सीधे 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर जाने से बचें
3. एक बार 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर सोने की ऊंचाई को प्रतिदिन 1,600 फीट (500 मीटर) से अधिक नहीं बढ़ाएं
4. प्रत्येक 3,300 फीट (1,000 मीटर) पर अनुकूलन के लिए एक अतिरिक्त दिन की योजना बनाएं.

उच्च ऊंचाई आपके शरीर को कैसे प्रभावित करती है?
– जब आप अधिक ऊंचाई पर होते हैं, तो पतली हवा के कारण आपके फेफड़ों को कम ऑक्सीजन प्राप्त होती है. यह आपके फेफड़ों और हृदय पर इसलिए ज्यादा जोर बढ़ा देता है क्योंकि आपके शरीर के बाकी हिस्सों को भी लगातार ऑक्सीजन युक्त रक्त की जरूरत होती है. जिसकी मात्रा पर अशर पड़ने लगता है. इसी वजह से बहुत अधिक ऊंचाई पर बहुत से स्वस्थ लोगों को भी चक्कर आना, सिरदर्द और थकान जैसे दिक्कतें होने लगती हैं। 

अगर कोई हृदय संबंधी दिक्कतों से गुजर रहा है तो इस ऊंचाई पर क्या अनुभव करता है?

– यदि आप किसी हृदय संबंधी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का अनुभव करते हैं तो अधिक ऊंचाई का आपके शरीर पर और भी अधिक प्रभाव पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को आमतौर पर ऊंचाई वाले स्थान पर पहुंचने के तुरंत बाद हृदय गति और रक्तचाप दोनों में बढोतरी महसूस होगी. ये समस्याएं आमतौर पर रात में और ज्यादा हो जाएंगी। 

अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी होता है क्या?
– इस बात के प्रमाण हैं कि अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं. हार्वर्ड स्कूल ऑफ ग्लोबल हेल्थ के एक अध्ययन में पाया गया कि अधिक ऊंचाई पर रहने वाले व्यक्तियों में इस्केमिक हृदय रोग से मरने की संभावना कम होती है. उनकी जीवन प्रत्याशा आमतौर पर लंबी होती है। 

क्या हृदय रोग से पीड़ित रोगी अधिक ऊंचाई पर यात्रा कर सकते हैं?
– जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में पाया गया कि उच्च रक्तचाप या हृदय रोग वाले व्यक्तियों के लिए ऊंचाई वाले स्थानों पर जाना खतरनाक हो सकता है। 
अध्ययन के अनुसार, उच्च ऊंचाई वाले स्थानों (9,840 फीट और अधिक) में कठोर शारीरिक गतिविधियों में संलग्न होने से हृदय रोग वाले लोगों के हृदय और रक्त वाहिकाओं पर बहुत अधिक तनाव पड़ सकता है, जिससे कई तरह के लक्षण हो सकते हैं। 

– सांस लेने में कठिनाई
– चक्कर आना
– छाती में दर्द
– थकान

हृदय रोगों के साथ अधिक ऊंचाई पर यात्रा करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

  • – हृदय रोग के साथ उच्च ऊंचाई पर पानी पीनाकुछ सामान्य सिफ़ारिशें हैं जिनका उच्च ऊंचाई वाले स्थानों की यात्रा करते समय हृदय रोग से पीड़ित सभी लोगों को पालन करना चाहिए:
  • – अपने उच्च ऊंचाई वाले स्थान पर चढ़ने से पहले मध्यवर्ती ऊंचाई पर एक या अधिक रातें बिताकर धीरे-धीरे उच्च ऊंचाई पर अभ्यस्त हो जाएं
  • – समुद्र तल पर आपकी आदत की तुलना में धीमी गति और कम तीव्रता से व्यायाम करें
  • – उचित रूप से हाइड्रेटेड रहें
  • – पूरी नींद लें
  • – उच्च ऊंचाई पर हृदय और रक्तचाप की दवाओं को संभावित रूप से समायोजित करने की आवश्यकता के बारे में अपने हृदय रोग विशेषज्ञ से बात करें.

बिजली बिल मामले में रेलवे को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की 10 साल पुरानी दलील; देना होगा ₹15,000 करोड़ सरचार्ज

नई दिल्ली
 सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक भारतीय रेलवे को बड़ा वित्तीय झटका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि रेलवे बिजली कानून के तहत कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं है. उसे अन्य औद्योगिक इकाइयों की तरह ही अपनी बिजली खपत पर सभी तरह के सरचार्ज देने होंगे. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने रेलवे की आठ अपीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के पुराने फैसले को सही ठहराया है. इस फैसले से राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन रेलवे के बजट पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने की आशंका है। 

रेलवे पर क्यों फूटा 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बम?
भारतीय रेलवे हर साल करीब 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करती है. इस बड़े फैसले के बाद रेलवे को बैकडेटेड एरियर यानी पुराना बकाया भी चुकाना होगा. राज्यों के हिसाब से यह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज 50 पैसे से लेकर 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है। 

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे रेलवे के ओपन एक्सेस इस्तेमाल की अवधि और क्षेत्र के हिसाब से बकाया राशि का आकलन करें. रेलवे के आंतरिक अनुमानों के अनुसार यह कुल बकाया राशि कम से कम 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम रेलवे के चालू वित्त वर्ष के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। 

10 साल पुराने कानूनी दांवपेंच में कहां मात खा गई रेलवे?

    रेलवे साल 2015 से अदालत में यह दलील दे रही थी कि वह एक ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ है. इस रणनीति के पीछे रेल मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय का साल 2014 का एक पत्र था। 

    रेलवे का दावा था कि रेलवे एक्ट 1989 की धारा 11 के तहत उसे खुद का बिजली नेटवर्क और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाने का अधिकार प्राप्त है. इसलिए वह ग्रिड से सीधे बिजली लेते समय किसी भी तरह का सरचार्ज देने के लिए उत्तरदायी नहीं है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनन डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी होने के लिए दूसरों को बिजली बेचना जरूरी है, जबकि रेलवे पूरी बिजली खुद ही कंज्यूम करती है। 

रेलवे डिस्ट्रीब्यूटर है या सिर्फ एक कंज्यूमर?
सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि रेलवे का पूरा ओवरहेड इक्विपमेंट और ट्रैक्शन सबस्टेशन उसका आंतरिक सिस्टम है. यह कोई पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम नहीं है. बिजली कानून के तहत लाइसेंसी कहलाने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। 

    पहली शर्त यह कि आपके पास डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो.
    दूसरी यह कि आप किसी तीसरे पक्ष को बिजली की सप्लाई करते हों.

रेलवे जो भी बिजली खरीदती है, उसका इस्तेमाल केवल इंजनों, सिग्नलों और स्टेशनों को चलाने में होता है. वह इसे किसी बाहरी उपभोक्ता को नहीं बेचती है. इसी आधार पर कोर्ट ने रेलवे को बिजली कानून की धारा 2(15) के तहत सिर्फ एक कंज्यूमर माना है। 

क्या अब फेल हो जाएगी रेलवे की महा-बचत योजना?
रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहम्मद जमशेद के अनुसार, इस अदालती आदेश में रेलवे की पूरी वित्तीय बचत को खत्म करने की क्षमता है. रेलवे ने साल 2015 के आसपास एक बड़ी नीतिगत पहल शुरू की थी. इसके तहत ओपन एक्सेस से सस्ती बिजली खरीदकर एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाने का लक्ष्य था. यह नया फैसला उस पूरी योजना पर पानी फेर सकता है। 

रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है. इस मिशन पर करीब 46,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने की यह मुहिम अब ओपन एक्सेस मार्केट के महंगे सरचार्ज के जाल में फंस गई है। 

पाकिस्तान के ‘इस्लामिक NATO’ के जवाब में भारत की बड़ी रणनीति, मुस्लिम देशों में बढ़ सकती है हलचल

नई दिल्ली

ईरान जंग ने मौजूदा वर्ल्‍ड ऑर्डर को उलट-पुलट कर रख दिया है. होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल और LPG लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है. मौजूदा संकट को देखते हुए अब तमाम देश एनर्जी सप्‍लाई के लिए अल्‍टरनेटिव रूट डेवलप करने की कोशिश में जुटे हैं. इसके साथ ही पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देशों के आपसी रिश्‍ते भी बदलने लगे हैं. पुराने समीकरण ध्‍वस्‍त हो रहे हैं तो नए गुट बन रहे हैं. पाकिस्‍तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर इस्‍लामिक NATO की नींव रखने का काम किया है. इन तीनों देशों का लक्ष्‍य संकट के समय एक-दूसरे का साथ देना है. हालांकि, अभी तक यह बस जुबानी जमाखर्च ही साबित हुई है. दूसरी तरफ, इस त्रिकोणीय गठजोड़ के अपने सामरिक महत्‍व भी हैं. अब भारत ने कथित इस्‍लामिक NATO का जवाब अपने अंदाज में तैयार कर लिया है. दिलचस्‍प बात यह है कि इसमें इजरायल की भी एंट्री मानी जा रही है. बता दें कि कुछ दिनों पहले ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू की UAE यात्रा की बात सामने आई थी. हालांकि, इसे खारिज कर दिया गया है. इटली के सामरिक मामलों के एक्‍सपर्ट मानते हैं कि भारत, UAE और इजरायल का गठजोड़ पश्चिम एशिया में शांति के लिए X फैक्‍टर साबित हो सकता है। 

इटली के जियोपॉलिटकल एक्‍सपर्ट सर्गियो रेस्टेली ने ‘टाइम्‍स ऑफ इजरायल’ में लिखे लेख में भारत, UAE और इजरायल के त्रिकोणीय गठजोड़ की बात कही है. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक रणनीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्गियो रेस्टेली ने The Times of Israel में प्रकाशित अपने लेख में कहा है कि भारत को संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और ईरान के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की कला विकसित करनी होगी. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को खाड़ी देशों को भरोसा दिलाते हुए ईरान के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखने चाहिए और साथ ही इजरायल के साथ सहयोग को भी मजबूत करना चाहिए. रेस्टेली के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया UAE यात्रा ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में संघर्षों ने वैश्विक शक्तियों की विदेश नीति की परीक्षा लेनी शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि भारत और यूएई के संबंध अब केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निवेश, बुनियादी ढांचा, रक्षा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक और समुद्री संपर्क जैसे क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। 

भारत के लिए यूएई और इजरायल का महत्‍व
इतालवी एक्‍सपर्ट ने यूएई को ऐसा साझेदार बताया जो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को व्यवहारिक परियोजनाओं में बदलने की क्षमता रखता है. उनके मुताबिक, अबू धाबी भारत की पश्चिम एशिया नीति का अहम स्तंभ बनता जा रहा है. रेस्टेली लिखते हैं कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता घरेलू आर्थिक मुद्दा भी है, क्योंकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी व्यवधान का असर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और घरेलू बजट पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि भारत के इजरायल के साथ रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, जल प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं. वहीं, यूएई पूंजी, भौगोलिक पहुंच और क्षेत्रीय स्वीकार्यता प्रदान करता है. रेस्टेली के अनुसार, यूएई और इजरायल मिलकर पश्चिम एशिया में एक नए व्यावहारिक ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, जो नारों की बजाय बुनियादी ढांचे, इनोवेशन और स्थिरता पर आधारित है। 

ईरान भारत के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण
सर्गियो रेस्टेली ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपनी पश्चिम एशिया नीति को किसी एक धुरी तक सीमित नहीं कर सकता. उनके मुताबिक, ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से. उन्होंने चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) को भारत-ईरान साझेदारी का सबसे ठोस उदाहरण बताया. रेस्टेली ने कहा कि ईरानी विदेश मंत्री अब्‍बास अरागची (Abbas Araghchi) की दिल्ली यात्रा ने यह संकेत दिया कि भारत तेहरान के साथ गंभीर संवाद बनाए रखना चाहता है. उनके अनुसार, संकटग्रस्त क्षेत्र में सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की क्षमता ही जिम्मेदार कूटनीति की पहचान है. लेख में कहा गया कि यूएई भारत की उभरती पश्चिम एशिया रणनीति का मुख्य आधार है, इजरायल तकनीक और रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोगी है, जबकि ईरान संपर्क और क्षेत्रीय संकट प्रबंधन के लिए आवश्यक साझेदार बना रहेगा. रेस्टेली ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अबू धाबी यात्रा ने यह स्पष्ट किया कि भारत अब केवल तेल आयातक देश के रूप में नहीं, बल्कि अपने हितों और रणनीतिक विकल्पों के साथ एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका तय कर रहा है। 

ग्रामीणों तक पहुंचीं शासकीय योजनाएं, शिविर में ही हुआ समस्याओं का समाधान

रायपुर

सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत एर्राबोर में आयोजित ‘सुशासन तिहार’ शिविर ग्रामीणों के लिए राहत और खुशियों का केंद्र बन गया। कलेक्टर  अमित कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ प्राप्त किया।

शिविर का उद्देश्य शासन की योजनाओं और सेवाओं को सीधे ग्रामीणों तक पहुंचाना था। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर उपस्थित रहकर लोगों की समस्याएं सुनीं और त्वरित समाधान की प्रक्रिया शुरू की।

शिविर में विद्यार्थियों को जाति प्रमाण पत्र वितरित किए गए। वहीं गर्भवती महिलाओं की गोद भराई और 6 माह के बच्चों का अन्नप्राशन कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इससे कार्यक्रम में सामाजिक और मानवीय जुड़ाव का वातावरण देखने को मिला।

ग्रामीणों की सुविधा के लिए शिविर में राशन कार्ड ई-केवाईसी, महतारी वंदन योजना ई-केवाईसी, नया आधार कार्ड पंजीयन एवं अपडेट, बी-1 और किसान किताब वितरण तथा एग्री स्टेक पंजीयन जैसी जरूरी सेवाएं भी मौके पर उपलब्ध कराई गईं।

शिविर के दौरान विभिन्न विभागों को कुल 250 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें पंचायत विभाग के 165, कृषि विभाग के 22, विद्युत विभाग के 14 तथा राजस्व और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के 11-11 आवेदन शामिल रहे। सभी आवेदनों पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है।

कार्यक्रम में स्थानीय सरपंच मती लक्ष्मी कट्टम, पूर्व सरपंच, पंचगण, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। सुशासन तिहार के माध्यम से प्रशासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास और सहभागिता को नई मजबूती मिली है।

भोपाल MANIT में बन रहे हाईटेक रोबोट, गैस रिस्क और हाई-अल्टीट्यूड मिशन में करेंगे इंसानों का काम

भोपाल

भोपाल: राजधानी का मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानि मैनिट अब सिर्फ इंजीनियरिंग केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य की रोबोटिक क्रांति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है. यहां ऐसे स्मार्ट रोबोट और एडवांस ड्रोन तैयार किए जा रहे हैं, जो खदानों, सीवर लाइन, जहरीली गैस वाले इलाकों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों के मिशन में इंसानों की जगह काम करेंगे. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ये मशीनें उन जगहों पर भेजी जाएंगी, जहां हर कदम पर जान का खतरा होता है। 

मैनिट में भविष्य की रोबोटिक टेक्नोलॉजी
मैनिट स्थित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर और आईओटी एंड रोबोटिक्स लैब में कई हाईटेक प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है. यहां वैज्ञानिक और रिसर्चर्स ह्यूमनॉइड रोबोट, क्वाड्रेट रोबोट और एडवांस सर्विलांस ड्रोन विकसित कर रहे हैं. इन मशीनों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रिस्क एरिया में बिना मानवीय हस्तक्षेप के काम कर सकें. यह तकनीक आने वाले समय में औद्योगिक सुरक्षा और सामरिक मिशनों में बड़ा बदलाव ला सकती है। 

जहां इंसान नहीं पहुंच सकते, वहां जाएंगे ये रोबोट
खदानों, केमिकल इंडस्ट्री और गैस रिस्क एरिया में अक्सर जहरीली गैसों के रिसाव या आक्सीजन की कमी के कारण बड़े हादसे होते हैं. ऐसे हालात में इंसानों को भेजना बेहद खतरनाक साबित होता है. मैनिट में तैयार किए जा रहे रोबोट्स को खासतौर पर ऐसे ही क्षेत्रों के लिए डिजाइन किया जा रहा है. ये मशीनें खतरनाक जगहों पर जाकर डेटा जुटाएंगी, गैस लेवल की जांच करेंगी और रियल टाइम मॉनिटरिंग करेंगी. इससे रेस्क्यू ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित और तेज हो सकेंगे। 

चार पैरों वाले क्वाड्रेट रोबोट होंगे खास आकर्षण
मैनिट की लैब में विकसित किए जा रहे क्वाड्रेट रोबोट सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. चार पैरों पर चलने वाले ये रोबोट ऊबड़-खाबड़ रास्तों, पहाड़ी इलाकों और संकरी सुरंगों में आसानी से मूव कर सकते हैं. इनकी डिजाइनिंग ऐसी की जा रही है कि वे इंसानों की तरह संतुलन बनाए रखते हुए कठिन परिस्थितियों में भी लगातार काम कर सकें. भविष्य में इनका उपयोग सेना, आपदा प्रबंधन और इंडस्ट्रियल सर्विलांस में किया जा सकता है। 

हाई-अल्टीट्यूड मिशन के लिए बन रहे एडवांस ड्रोन
मैनिट के प्रोफेसर मितुल कुमार अहिरवार ने बताया कि “रोबोटिक्स प्रोजेक्ट के साथ-साथ मैनिट में हाई-अल्टीट्यूड ड्रोन टेक्नोलॉजी पर भी रिसर्च चल रही है. ये ड्रोन पहाड़ी क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों और जटिल संरचनाओं की निगरानी कर सकेंगे. खराब मौसम या जोखिम वाले क्षेत्रों में भी इनकी मदद से सटीक सर्विलांस किया जा सकेगा. आपदा प्रबंधन के दौरान यह तकनीक राहत और बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

कम लागत में तैयार होगी स्वदेशी तकनीक
दरअसल, विदेशी रोबोटिक मशीनों की कीमत काफी अधिक होती है, जिससे उनका बड़े स्तर पर उपयोग मुश्किल हो जाता है. मैनिट की टीम इन रोबोट्स और ड्रोन को कम लागत में विकसित करने पर फोकस कर रही है. रिसर्च का दावा है कि कम बजट के बावजूद इनकी एक्यूरेसी और कार्यक्षमता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. इससे देश में सस्ती और भरोसेमंद रोबोटिक तकनीक उपलब्ध हो सकेगी। 

पेटेंट के बाद बाजार में आएंगी तकनीकें
मैनिट में चल रहे कई प्रोजेक्ट अब एडवांस रिसर्च लेवल तक पहुंच चुके हैं. इन तकनीकों के लिए पेटेंट भी फाइल किए जा चुके हैं. पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन रोबोट्स और ड्रोन को कमर्शियल मार्केट और पब्लिक डोमेन में उतारा जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ये तकनीकें देश की सुरक्षा, इंडस्ट्रियल मानिटरिंग और रिस्की आपरेशंस का चेहरा बदल सकती हैं। 

मध्य प्रदेश में गर्मी की छुट्टियों के बाद सरकारी स्कूलों में शुरू होगी गेस्ट टीचर्स की जॉइनिंग प्रक्रिया

भोपाल
 मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर दी है। ग्रीष्मावकाश समाप्त होने के बाद 16 जून से स्कूल खुलते ही रिक्त पदों पर ज्वाइनिंग दी जाएगी। इसके लिए विभाग द्वारा विषयवार खाली पदों की सूची भी जारी कर दी गई है। इसके अनुसार माध्यमिक शिक्षक वर्ग में सबसे अधिक रिक्तियां अंग्रेजी, गणित और संस्कृत विषय में सामने आई हैं।

इन विषयों में नियमित शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। ऐसे में नए शिक्षा सत्र की शुरुआत से पहले ही अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है।

स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिलेवार और विषयवार रिक्त पदों के अनुसार पात्र अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित स्कूलों में आवश्यकता के अनुसार अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति एक जुलाई से की जाएगी। इससे स्कूलों में पढ़ाई सुचारु रूप से संचालित हो सकेगी।

70 हजार पद पर अतिथि शिक्षक पदस्थ
प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में हर वर्ष बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है। इस बार भी 70 हजार पदों पर अतिथि शिक्षकों को अवसर मिलने की संभावना है। इनकी सेवाएं 30 अप्रैल को समाप्त हुई है। अब एक जुलाई से इनकी पदस्थापना की जाएगी। अतिथि शिक्षकों से आनलाइन पोर्टल पर स्कोर कार्ड जनरेट किए जा रहे हैं।

भोपाल में कभी भी पहुंच सकती है स्वच्छ सर्वेक्षण टीम, शहरभर में सफाई और सौंदर्यीकरण अभियान तेज

भोपाल

भोपाल में स्वच्छ सर्वेक्षण के लिए टीम अगले 2 दिन के अंदर आ सकती है। टीम के आने से पहले नगर निगम वह सभी कवायदें कर रहा है, जो उसे बेहतर अंक दिला सके। सोमवार को जोन-9 के पंजाबी बाग में एक गली में समुद्र की आकृति की उकेर दी गई। दूसरी ओर, लोगों को बेहतर फीडबैक के लिए प्रेरित भी किया जा रहा है। हालांकि, इस बार भोपाल को कागजों के साथ जमीन पर भी सफाई साबित करनी होगी।

85 वार्ड, 40 स्कूल और हर कोना होगा स्कैन
इस बार सर्वेक्षण टीम का दायरा पहले से कहीं बड़ा है। टीम भोपाल के सभी 85 वार्डों में जाएगी और सफाई व्यवस्था का ग्राउंड लेवल पर निरीक्षण करेगी। इसके अलावा लगभग 40 स्कूलों में भी स्वच्छता की स्थिति जांची जाएगी। बच्चों के आसपास का वातावरण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता स्तर भी रैंकिंग का हिस्सा होगा।

नगर निगम ने दिए सख्त निर्देश
स्वच्छ सर्वेक्षण को देखते हुए नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने कचरा ट्रांसफर स्टेशनों की स्थिति सुधारने और मिश्रित कचरा संग्रहण पर पूरी तरह रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। निगम प्रशासन ने नागरिकों से भी अपील की है कि वे गीला और सूखा कचरा अलग-अलग दें, ताकि शहर को स्वच्छ सर्वेक्षण में बेहतर रैंकिंग मिल सके।

शहर को चमकाने की कोशिश जारी 
नगर निगम ने शहर को आकर्षक दिखाने के लिए कई जगहों पर पेंटिंग, 3D आर्ट और स्क्रैप से बनी कलाकृतियां लगाई हैं। लगभग 60 हजार वर्गफीट क्षेत्र को इस तरह सजाया गया है। 

इसी वजह से सड़कों की सफाई, नालों की सफाई, सार्वजनिक शौचालयों की सफाई, बैक लेन में पेंटिंग और बाजारों में टाइल्स लगाने का काम शुरू किया गया है। न्यू मार्केट, 10 नंबर मार्केट, पुराना शहर, करोंद, कोलार, बैरागढ़ जैसे बड़े बाजारों में सौंदर्यीकरण और कचरा उठाने के काम को प्राथमिकता दी जा रही है।

ये बड़ी चुनौती

हालांकि, जमीन पर अब भी कई जगह गंदगी, टूटे डस्टबिन, उखड़ी सड़कें और खुले नाले जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में विजिबल क्लीनलीनेस के लिए तय 1500 अंक भोपाल के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

स्वच्छता रैंकिंग कैसे तय होगी?
इस बार सिस्टम पूरी तरह डेटा और ग्राउंड रियलिटी पर आधारित है। रैंकिंग ऑन-ग्राउंड असेसमेंट, सिटीजन फीडबैक, विजिबल क्लीनलीनेस (1500 अंक), ODF/ODF++ और वॉटर प्लस (1000 अंक) और गारबेज फ्री सिटी रेटिंग (1000 अंक) जैसे पैरामीटर्स पर तय होगी।

बाजारों में सबसे बड़ी चुनौती 
भोपाल के न्यू मार्केट, 10 नंबर मार्केट, पुराना शहर, कोलार, करोंद और बैरागढ़ जैसे बड़े बाजारों में भी सफाई एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। नियम के अनुसार रिहायशी इलाकों में रोज एक बार सफाई, बाजार और स्टेशन और फूड जोन में दिन में दो बार सफाई जरूरी है, लेकिन कई जगह यह सिस्टम अभी भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।

बैक लेन और गलियों पर खास फोकस
शहर की बैक लेन यानी पीछे की गलियां भी इस बार स्कोरिंग का बड़ा हिस्सा हैं। यहां सफाई और रखरखाव के लिए 200 अंक तय किए गए हैं। कई जगहों पर इन गलियों में रंगीन पेंटिंग और सफाई अभियान चल रहे हैं, लेकिन स्थायी सुधार अभी बाकी है।

दीवारें साफ, लेकिन नीचे कचरा
150 अंकों वाले इस पैरामीटर में सार्वजनिक जगहों को साफ रखना जरूरी है खासतौर पर पान-गुटखे के निशान और खुले में गंदगी से मुक्त रखना। लेकिन हकीकत यह है कि कई जगह बैरिकेड्स और दीवारें खुद अनचाही गंदगी पॉइंट बन चुकी हैं।

3 करोड़ की पेंटिंग का काम 
शहर में वॉल पेंटिंग, म्यूरल्स और आर्ट
वर्क पर करीब 3 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके साथ गड्ढामुक्त सड़क और ग्रीनरी बढ़ाने की कोशिश भी हो रही है। शहर में कुछ जोन में सफाई पूरी हो चुकी है। भानपुर में 50 करोड़ रुपए की लागत से एसटीपी प्रोजेक्ट भी चल रहा है, जो भविष्य की दिशा तय करेगा।

आदमपुर कचरा खंती- बड़ी चुनौती
भोपाल के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द आदमपुर कचरा खंती है। यहां जमा पुराना कचरा (legacy waste) आज भी वैसा ही है। कचरे का पहाड़, गंदा पानी का रिसाव और बार-बार आग लगने की घटनाएं। यह सब मिलकर शहर की रैंकिंग को हर साल नीचे खींचते हैं।

अंतिम दौर में इन कामों पर फोकस जानकारी के अनुसार, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 में विजिबल क्लीनलीनेस यानी जमीन पर दिखने वाली सफाई पर विशेष फोकस किया है। नई गाइडलाइंस के तहत शहरों की रैंकिंग 10 मुख्य इंडिकेटर्स के आधार पर तय होगी।

इसी वजह से निगम बैक लेन से लेकर नालों और कचरा पॉइंट तक सुधार कार्यों में जुटा है। सोमवार को पंजाबी बाग की बैक लेन का काम पूरा किया गया। मंगलवार को भी कई जगहों पर पेंटिंग को अंतिम रूप दिया जाएगा।

ऐसे तय होगी रैंकिंग

    ऑन-ग्राउंड असेसमेंट और 10,500
    सिटीजन फीडबैक
    विजिबल क्लीनलीनेस 1,500
    ODF/ODF++/वाटर प्लस 1,000
    कचरा मुक्त शहर स्टार रेटिंग 1,000

ये कारण- सर्वेक्षण और चुनौती

बाजारों में कचरा बड़ी चुनौती

आवासीय क्षेत्रों और पार्कों में रोज एक बार, जबकि व्यावसायिक स्थलों, बस-रेलवे स्टेशनों, पर्यटन स्थलों और स्ट्रीट फूड जोन में दिन में दो बार सफाई जरूरी होगी। इस पैरामीटर के लिए सबसे ज्यादा 300 अंक हैं। कई मार्केट में अब भी कचरा और गंदगी बड़ी समस्या बनी हुई है।

गंदगी पर कट सकते हैं नंबर

घरों और दुकानों के पीछे की गलियों यानी बैक लेन की सफाई और रखरखाव के लिए 200 अंक तय हैं। शहर के कई इलाकों में बैक लेन में रंगीन पेंटिंग और सफाई अभियान जारी है।

बैरिकेड्स बिगाड़ रहे सफाई स्कोर

सार्वजनिक स्थलों और दीवारों को पान-गुटखे के धब्बों और खुले में पेशाब के निशानों से मुक्त रखने पर 150 अंक मिलेंगे। निर्माण कार्यों के दौरान लगाए गए बैरिकेड्स पीकदान बन चुके हैं। निगम ने एजेंसियों को इन्हें साफ करने की चेतावनी दी है, लेकिन हालात नहीं सुधरे हैं।

बिना अमेरिकी हमले के ही ईरान को बड़ा झटका! Inflation Attack ने बढ़ाई टेंशन, अब क्या होगा?

तेहरान 

अमेरिका के साथ ईरान के सीजफायर के बावजूद तनाव बरकरार है, होर्मुज को लेकर घमासान जारी है और इसके साथ ही तेल-गैस को लेकर दुनिया की टेंशन भी हाई बनी हुई है. लेकिन एक ओर जहां मिडिल ईस्ट युद्ध ने अमेरिका में तेल की कीमतों में इजाफा किया है, तो वहीं तेल पर निर्भर खुद ईरान की इकोनॉमी को भी तगड़ा झटका लगा है. वर्ल्ड ऑफ स्टेटिस्टिक्स के मुताबिक, दुनिया के सबसे ज्यादा महंगाई दर वाले देशों की लिस्ट में ईरान वेनेजुएला के बाद दूसरे नंबर पर आ गया है। 

तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में भी आंकड़ों के साथ बीते कुछ दिनों में ईरान की गंभीर स्थिति को दर्शाया गया है कि युद्ध के बीच आसमान छूती महंगाई में ईरान के लोगों की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट आ गया है. अब दुनिया में महंगाई से सबसे ज्यादा त्रस्त देशों की लिस्ट में भी ईरान ऊपर चढ़ता जा रहा है। 

वेनेजुएला के बाद ईरान का नंबर
वर्ल्ड ऑफ स्टेटिस्टिक्स के सोशल मीडिया पोस्ट पर नजर डालें, तो ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महंगाई दर वेनेजुएला में 612% है और इसके बाद अर्जेंटीना के बजाय अब ईरान का नाम शामिल है, जहां सालाना महंगाई दर 50% हो चुकी है। 

बीते सप्ताह आई एक रिपोर्ट में ईरान में महंगाई की मार की तस्वीर पेश करते हुए कहा गया था कि Iran Inflation की रफ्तार हालिया कुछ समय में सबसे ज्यादा रही है और ये लगातार ईरानियों को गरीब बना रही है. तेहरान की एक निवासी के हवाले से अल जजीरा की रिपोर्ट में कहा गया कि हम अब उन कुछ चीजों को खरीदने का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं, जो कुछ महीने पहले तक खरीद सकते थे. इसके पीछे वजह है कि युद्धग्रस्त ईरान में खासतौर पर खाद्य महंगाई (Iran Food Inflation) में आए उछाल के कारण लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरत के सामनों पर खर्च हो रहा है। 

इसमें आंकड़े देते हुए बताया गया था कि वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे अधिक 350% से ज्यादा, आयातित चावल की कीमतों में 200%, ईरानी चावल की कीमतों में 175% प्रतिशत और चिकन की कीमतों में 190%  की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

इन 10 देशों में महंगाई का कोहराम
दुनिया के तमाम देशों में सालाना महंगाई दर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो जिन देशों में महंगाई सबसे ज्यादा कोहराम मचा रही है, उनकी टॉप-10 लिस्ट में पहले नंबर पर वेनेजुएला, जबकि दूसरे नंबर पर ईरान का नाम है. वहीं अन्य देशों की बात करें, तो अर्जेंटीना (32.4%), तुर्किए (32.37%), लेबनान (17.3%), नाइजीरिया (15.69%), इजिप्ट (14.9%), पाकिस्तान (10.9%), कजाखिस्तान (10.6%) और बांग्लादेश (9.05%) शामिल हैं। 

दुनिया के ‘ऑयल बैंक’ तेजी से हो रहे खाली, एक्सपर्ट्स बोले- हिल सकता है वैश्विक बाजार

 नई दिल्ली

ईरान जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से दुनिया में तेल खत्म होने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. तीन महीने पहले तक यह संभावना बेहद कम लग रही थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. होर्मुज स्ट्रेट लगभग पूरी तरह बंद रहने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की भारी कमी का खतरा बढ़ता जा रहा है। 

विश्लेषकों को अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है. इसके बजाय उनका कहना है कि युद्ध लंबे समय तक चल सकता है जिससे एनर्जी सप्लाई लंबे समय तक बाधित रह सकती है. उनके अनुसार, तेल आपूर्ति की तस्वीर बिल्कुल अच्छी नहीं दिख रही। 

डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी से 8 मई तक मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति में कुल 78.2 करोड़ बैरल की कमी आ चुकी थी और इस महीने के अंत तक यह आंकड़ा 1 अरब बैरल तक पहुंच सकता है। 

दैनिक उत्पादन के हिसाब से भी हालात गंभीर हैं. सऊदी अरब रोजाना 30 लाख बैरल से ज्यादा तेल उत्पादन गंवा रहा है. इराक का तेल उत्पादन 28.8 लाख बैरल प्रतिदिन कम हो गया है, जबकि ईरान का उत्पादन 16.9 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है. कुवैत में भी रोजाना 17.5 लाख बैरल की गिरावट दर्ज की गई है। 

तेल उत्पादन घटा, दुनिया रिजर्व रखे तेल पर चल रही
इतने बड़े स्तर पर तेल उत्पादन बंद होने के बाद दुनिया पहले से निकाले गए तेल के भंडार को इस्तेमाल कर रही है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) पहले कह चुकी थी कि दुनिया के तेल भंडार रिकॉर्ड स्तर पर हैं और इसी वजह से बाजार में भारी अतिरिक्त सप्लाई की संभावना थी. लेकिन यह अनुमान युद्ध शुरू होने से पहले का था. अब IEA चेतावनी दे रही है कि इस साल तेल की मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी। 

‘द ऑयल प्राइस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, IEA की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना करीब 39 लाख बैरल की गिरावट आ सकती है. हालांकि, यह आंकड़ा भी मध्य पूर्व में मौजूदा वास्तविक नुकसान से काफी कम है. एजेंसी का अनुमान है कि मध्य पूर्व में आपूर्ति में 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी हो चुकी है. दूसरी ओर, मांग में सिर्फ 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने का अनुमान है। 

अटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल एनर्जी सेंटर की वरिष्ठ फेलो एलेन वाल्ड ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, ‘खपत को एक सीमा तक ही कम किया जा सकता है. जब भंडार खत्म होंगे तो वे सचमुच खत्म हो जाएंगे. एक वक्त आएगा जब तेल की मांग और सप्लाई के बीच बड़ी खाई पैदा होगी और बाजार बुरी तरह हिल जाएगा. कीमतें तेजी से ऊपर जाएंगी। 

सऊदी अरामको के सीईओ ने भी दी है वॉर्निंग
यह चेतावनी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अमीन नासिर के बयान से भी मेल खाती है. उन्होंने कहा था कि दुनिया में जमीन पर मौजूद ईंधन भंडार रिकॉर्ड गति से घट रहे हैं. उनके मुताबिक, जमीन पर मौजूद तेल भंडार इस समय बाजार के लिए ‘एकमात्र सुरक्षा कवच’ हैं, लेकिन अब वे भी तेजी से कम हो रहे हैं। 

जमीन पर मौजूद तेल भंडार का मतलब उस तेल से होता है जो पहले ही जमीन से निकाल लिया गया है और बाद में इस्तेमाल के लिए बड़े टैंकरों, स्टोरेज फैसिलिटीज या रिजर्व में रखा गया हो. इस तेल को जरूरत की स्थिति, जैसे युद्ध, सप्लाई रुकना या कीमतें बढ़ना, में इस्तेमाल किया जाता है। 

जेपी मॉर्गन के कमोडिटी विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि अगले महीने तक विकसित देशों में व्यावसायिक तेल भंडार ‘ऑपरेशनल तनाव’ के स्तर तक पहुंच सकते हैं. इसका मतलब है कि तेल आपूर्ति में आई कमी को संभालना और मुश्किल हो जाएगा। 

तेल की कमी इतनी होगी कि होर्मुज खोलना ही होगा
जेपी मॉर्गन की वैश्विक कमोडिटी रणनीति प्रमुख नताशा कानेवा ने कहा, ‘हमारा निष्कर्ष है कि किसी न किसी तरह जून में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना ही होगा.’ उनके अनुसार, दुनिया तेल संकट से तभी बच सकती है जब युद्ध खत्म हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगला चरण सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रिफाइनिंग और अंतिम उपभोक्ता तक ईंधन पहुंचाने का संकट बन सकता है। 

अमीन नासिर ने यह भी कहा कि बाजार में तेल भंडार की उपलब्धता को बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है. उन्होंने बताया कि स्टोरेज में मौजूद सारा तेल वास्तव में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं होता. उसका बड़ा हिस्सा पाइपलाइन, न्यूनतम टैंक स्तर और अन्य परिचालन जरूरतों में फंसा रहता है. उन्होंने कहा, ‘यूरोप और अमेरिका में स्टोरेज से रोजाना अधिकतम 20 लाख बैरल तेल ही निकाला जा सकता है। 

केप्लर के अनुसार, फिलहाल भंडार से तेल निकासी सीमित स्तर पर है. मार्च के आखिर से अब तक जमीन पर मौजूद भंडार से करीब 6 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है. इसके बावजूद अभी करीब 3 अरब बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, हालांकि उसमें से कितना वास्तव में उपलब्ध है, यह साफ नहीं है। 

कमजोर होता दुनिया का सुरक्षा कवच
विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो भंडार तेजी से घटेंगे और उन्हें दोबारा भरने के लिए पर्याप्त नई सप्लाई उपलब्ध नहीं होगी. यानी युद्ध जितना लंबा चलेगा, दुनिया का सुरक्षा कवच उतना कमजोर होता जाएगा। 

हालांकि, कुछ राहत की खबर भी है. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, बाजार अब इस स्थिति का आदी होने लगा है. भंडार से तेल निकालने की वजह से तत्काल घबराहट कम हुई है और अब बाजार कमी को मैनेज करना सीख रहा है जिसका मतलब है कि तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। 

कैपिटल इकोनॉमिक्स के कमोडिटी अर्थशास्त्री हमाद हुसैन ने कहा, ‘तेल कार्गो की तत्काल खरीद की होड़ अब कम हो गई है. लेकिन हम तेजी से भंडार खाली कर रहे हैं और इसका सीधा असर कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा। 

पढ़ें देखें प्रोफाइल